सोमवार, अक्‍तूबर 03, 2005

भोजपुरी कविता 'ओझाई'

(आनन्द सन्धिदूतजी भोजपुरी के समसामयिक गीत-लेखन के एगो महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हईं. आज गांधी जयंती के अवसर पर व्यंग शैली में करेजा के भेद देव वाला उनकर लिखल एगो कविता 'ओझाई' के पहिला भाग रउआलो के सामने पेश करत तानी.)

'ओझाई'

जै-जै कार मनाई
गांधी महाराज के गोहराईं
जवाहिर के बोलाईं
मोलाना आज़ाद के किरिया खाईं
कि, दोहाई भगवान बुद्ध के
राजा अशोक के
कि, जेकरा परताप के दुनियां में बाजे डंका
धोजा फहराले कीरति के
फिरल दोहाई
साबरमती के
पवनार के
सदाकत आश्रम के
कि, नांव लेत रोंआ फरफराय
जीव गनगनाय
कि, राजेन्दर परसाद
सरदार पटेल
ऊलल-भूलल
छूटल छटकल
नेता पुरनियां के
देस-दुनियां के
कि, जेकर खाईं
ओकर जै-जै कार मनाईं
जै हो गीता-कुरान-पुरान
दोहाइ बार-बार
गुरु की जै
कि, मौलाना मोहम्मद अली
तोड़ द दुसमन क नली
कि तोहरा परताप से
ऊ गोता लगाईं
कि, समुन्दर सोख जाईं
कि हिमाले हींग के माफिक उड़ाईं
कि, पुरुबे रछपाल करें
सियारदास बलिस्टर
पछिमे लाला लजपत राय
उतरे मदन मोहन मालबी
मोती लाल नेहरू
दखिने राजगोपालाचारी
कि नांव लेत
बकार न आवे
काठ मार जाये
कि, फिरल दोहाई
सरोजिनी नायडू
कमला नेहरू
कस्तूरबा माई के
कि, तोहरा परताप से विजय पाईं
मुहें चन्नन लागे
लाज रहे
चढ़ बइठीं दुसमन के कपार पर
मंहगाई क झोंटा कबारीं
बेरोजगारी का लहंगा में आग लगाईं
गरीबी के नटी दबाईं
करेजा पर चढ़ बैइठीं
पूछीं-- बोल
हीत कि नात क
कुल क, खूंट क
अमेरिका क रूस क
पोरब कि पच्छिम क
बोल कहां क हइस
बामति हइस कि चुरइल
सी.आइ.ए. क करामात हइस
कि, के.जी.बी. क पाप हइस
कि, दोहाई बाबा बिनोबा के
कि, भूदान से मनबे
कि, सर्वोदय से
कि अंत्योदय से मनबे
कि जय समाजवाद के अखाड़ा
बाजे गल-बजउअल के नगाड़ा
कि, लगाईं बैकवर्ड के तड़ातड़ चटकना
चलाईं समग्र क्रांति के गरमेगरम सिंउठा
दोहाई हिरिया-जिरिया
ट्वंटी पाइंट प्रोगराम के
छू-ऊ-ऊ-ऊ!

क्रमश:
(दोसरका आउर अंतिम भाग अगिलका बार)

1 Comments:

At 12:48 पूर्वाह्न, Blogger Suraj Deo Singh said...

ओझा पढ के म़जा आ गईल, आनन्द सन्धिदूतजी के कविता के internet पर ले आवे के खातिर आप के बहुत बहुत धन्यबाद !!

 

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